ಕಾವ್ಯ ಸಂಗಾತಿ
ಶಮಾ ಜಮಾದಾರ
ಗಜಲ್


ನಿನ್ನ ಮಡಿಲಿನಲಿ ಮುಖವಿಟ್ಟು ಅಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಮನಸಿನಲ್ಲಿಯ ತಳಮಳಗಳ ಹೇಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಕುಣಿಯೊಳಗಿಳಿಸಿ ಹೊರಟೆ ತಿರುಗಿಯೂ ನೋಡದೆ
ವಿರಹದ ಭಾವವಿಹೀನತೆಯನು ಕೇಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಭೂಗರ್ಭದ ಶೀತಲತೆ ನೆನಪಿಸಿದೆ ನಿನ್ನ ಸಡಿಲಪ್ಪುಗೆ
ಬೇಡವಾದ ಬೇಡಿಯ ಸಂಸಾರ ಹೂಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಕೊನೆಯ ಉಸಿರಿನ ನಿರಾಳತೆಯ ಖುಷಿ ಹೇಳಲೆಂತು
ನೆನಪುಗಳ ಸಿರಿ ಸಂಪತ್ತಿನೊಂದಿಗೆ ಬಾಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಕೂದಲೆಳೆಯಿಂದ ಶಮೆಯ ಕತ್ತು ಸೀಳಿದ ಕಥೆಯಿದು
ಪ್ರೀತಿಯಲಿ ಶಹೀದಾಗಿ ಪ್ರೇಮವ ಆಳಬೇಕೆಂದಿರುವೆ
ಶಮಾ ಜಮಾದಾರ




ವಾಹ್ ಮೇಡಂ ಜೀ
ಕೂದಲೆಳೆಯಿಂದ ಶಮೆಯ ಕತ್ತು ಸೀಳಿದ ಕಥೆಯಿದು !
ಯಬ್ಬೋ .. ಎಂತಹ ಆಲೋಚನೆ? !
ಶ್ರೀವಲ್ಲಭ ಕುಲಕರ್ಣಿ
ಗಝಲ್ ಚೆನ್ನಾಗಿದೆ
शमा जमादार जी, आपकी ग़ज़ल में प्रेम, विरह, पीड़ा, स्मृतियों और जीवन की आंतरिक बेचैनी को हृदयस्पर्शी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। किसी की गोद में सिर रखकर रोने की इच्छा से लेकर यादों की अनमोल पूँजी के साथ जीवन बिताने की आकांक्षा तक, आपकी हर पंक्ति में भावनाओं की गहराई दिखाई देती है। प्रेम की पीड़ा, बिछड़ने का दर्द और प्रेम के लिए सब कुछ त्याग देने की भावना को आपने सुंदर प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
विशेष रूप से, “कूएँ में उतारकर चला गया, मुड़कर भी नहीं देखा” जैसे भाव और शमा के गले से जुड़ा प्रतीक पाठकों के मन में गहरी संवेदना उत्पन्न करते हैं। आपकी ग़ज़ल में प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि पीड़ा, त्याग और स्मृतियों का संगम बनकर सामने आता है।
शमा जी, आपकी ग़ज़ल में भावनाओं की तीव्रता, भाषा में काव्यात्मकता और अभिव्यक्ति में विशिष्टता है। प्रेम की मधुरता के साथ-साथ विरह की कड़वाहट को भी आपने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
आपकी कलम से इसी तरह अर्थपूर्ण और दिल को छू लेने वाली ग़ज़लें निकलती रहें। आपकी साहित्यिक यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहे। हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ! – jain